देहरादून NIU ✍️
मुख्यमंत्री उत्तराखंड पुष्कर सिंह धामी द्वारा देवभूमि उत्तराखंड को अपराध मुक्त और सुरक्षित बनाने के लिए अपराधियों के विरुद्ध अत्यंत कड़ी कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए हैं। जिसमे अपराध के प्रति ‘ज़ीरो टालरेंस’ व ‘आपरेशन प्रहार’ प्रमुख है। उक्त निर्देशों के क्रम मे निदेशक अभियोज द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों के क्रम मे न्यायालय, अभियोजन व पुलिस विभाग मे समन्वय स्थापित कर मुख्यमंत्री के अपराध मुक्त देवभूमि उत्तराखंड के विजन को साकार किया जा सकता है। इसका उद्देश्य राज्य मे शासन व्यवस्था एवं विधि का शासन स्थापित करना है। आपराधिक न्याय प्रणाली का लक्ष्य न्याय व्यवस्था एवं समाज मे न्याय की संकल्पना को स्थापित करना है। आपराधिक न्याय प्रणाली में अपराध घटित होने से लेकर दंडादेश तक जाँच/अन्वेषण एजन्सी, अभियोजन, एफ-एस-एल, करागार व न्यायपालिका एक मूलभूत स्तम्भ हैं। जाँच एजेसियों द्वारा प्रेषित आरोप पत्र न्यायालय के समक्ष न्याय-निर्णयन हेतु प्रस्तुत किया जाता है जिसमें राज्य की ओर से पैरवी व पीड़ित को न्याय दिलाने या न्याय-व्यवस्था स्थापित करने में न्यायालय का सहयोग करने हेतु अभियोजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

अभियोजन विभाग, उत्तराखंड गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। जिसका मुख्य कार्य जनपद न्यायालयों मे अभियुक्तों का अभियोजन कर दंडित कराना होता है। इसका कार्यालय उत्तराखंड राज्य के प्रत्येक जनपद के साथ-साथ सी०बी०सी०आई०डी० और सतर्कता मे अवस्थित है। अपराधियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही व सजा के प्रतिशत में वृद्धि करने के उद्देश्य से संयुक्त निदेशक विधि/ उपनिदेशक अभियोजन कार्यालय में तैनात अधिकारियों द्वारा स्वप्रेरणा से न्यायालय कार्यवाही के पश्चात एवं कार्यालय कार्य अवधि के पश्चात कार्य कर विवेचना मे सुधार हेतु विवेचनाओं का पर्यवेक्षण करने की इच्छा व्यक्त की गई है। जिस पर जनपद देहरादून मे अवस्थित कार्यालय संयुक्त निदेशक विधि/ जिला अभियोजन निदेशालय, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, देहरादून के मध्य आपसी समन्वय बनाकर इस माह ‘अभियान समन्वय’ प्रारंभ किया जा रहा है। जिसका मुख्य उद्देश्य त्रुटि पूर्ण विवेचना का परिशीलन कर विवेचक के साथ समन्वय स्थापित कर न्यायालय मे सुसंगत एवं ग्राह्य साक्ष्य प्रस्तुत करना है।
इस संबंध मे माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत वाद गुजरात राज्य बनाम किशन भाई आदि (2014) मे निर्णीत किया है कि अपराध की विवेचना और अभियोजन का सम्यक निगरानी करने हेतु जनपद स्तर समिति का गठन करना चाहिए। पुलिस की रिपार्ट को परीक्षण कर व उनकी कमियों की पूर्ति करना सुनिश्चित करना चाहिएजिससे कि साक्ष्यों की सही संकलन किया जा सके। पुलिस और अभियोजन विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों की एक स्थायी समिति को उपरोक्त जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए। इस समिति द्वारा विचार किए जाने वाले मामलों का उपयोग विवेचना और/या अभियोजन, या दोनों के दौरान हुई गलतियों को स्पष्ट करने के लिए किया जाना चाहिए।

इसी प्रकार इसी प्रकार मा० उच्च न्यायालय उत्तराखण्ड द्वारा याचिका सं०-(क्रि०) 874/2018 तेजपाल बनाम उत्तराखण्ड राज्य में भी विवेचनात्मक कार्यवाही हेतु दिशानिर्देश निर्गत किये। जिसके अनुपालन में कार्यालय पुलिस महानिदेशक उत्तराखण्ड, देहरादून द्वारा पत्रांक सं० डी०जी०- पाँच-24 (उच्च न्यायालय) 2018 दिनांक 27.06.2018 को निर्देश विवेचना व अभियोजन स्तर को निर्गत किये गये है, जिसमे उल्लेख किया गया है कि अन्वेषण के उपरांत पुलिस आरोप पत्र मा० न्यायालय भेजे जाने से पूर्व जनपदीय अभियोजन अधिकारी संकलित साक्ष्यों एवं आरोप पत्र का गंभीरता एवं सूक्षमता से परीक्षण करना सुनिश्चित करेंगे, जिसकी रिपोर्ट (ब्रीफ) जनपदीय अभियोजन अधिकारी तैयार करेंगे तथा अभियोजन अधिकारी द्वारा यह पाया जाता है कि मामले में गंभीर अनियमिततायें है, जिसमें अग्रिम विवेचना किया जाना आवश्यक है, उसकी रिपोर्ट अन्वेषण पत्रावली सहित संबन्धित क्षेत्राधिकारियों को प्रेषित करेंगे। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में जहाँ एक तरफ विवेचना को पारदर्शी व जवाबदेह बनाया गया है, वहीं दूसरी तरफ त्वरित न्याय की अवधारणा को भी प्रावधानित किया गया है। इस अवधारणा की पूर्ति के लिए अभियोजन विभाग को भी जवाबदेह एवं सुदृढ़ बनाया गया है। विवेचना को पारदर्शी बनाने के लिए गिरफ्तारी के समय, तलाशी एवं अभिग्रहण आदि मामले में’ विडियोग्राफी करना, माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा जारी दिशा निर्देशन का पालन करना, वैज्ञानिक साक्ष्य का संकलन करना एवं साक्ष्य संकलन के पश्चात् विवेचक का निष्कर्ष व रिपार्ट प्रेषित करना है।
अभियोजन विभाग की जवाबदेही एवं सुदृढ़ीकरण के लिए राज्य मे अभियोजन निदेशालय के अतिरिक्त प्रत्येक जनपद स्तर पर अभियोजन निदेशालय की स्थापना का प्रावधान किया गया है। अपराध की सजा के प्रावधान के आधार पर सात साल तक की सजा वाले मामले में सहायक निदेशक, सात साल से अधिक व 10 वर्ष से कम मे मामले में उपनिदेशक, व 10 वर्ष से अधिक सजा वाले मामले में निदेशक को मामले की त्वरित निपटान को सुनिश्चित करने व पुलिस द्वारा प्रेषित रिपार्ट की परीक्षा व संवीक्षा तथा मानीटर करने का प्रावधान है। नए आपराधिक विधि में विचारण के पश्चात् दोष मुक्त हुए मामलों के परीक्षण किए जाने का प्रावधान है। जिसके लिए जनपद स्तर पर अभियोजन निदेशालय स्थापित कर अभियोजन को सुदृढ किया गया है। आपराधिक न्याय प्रणाली को आधुनिक करते हुए समस्त स्तंभों को आधुनिक व नवीन तकनीकी से सुसज्जित किया जा रहा है, जिसमे आपराधिक न्याय प्रणाली के समस्त कार्यवाही को एक दूसरे से जोड़ने, सूचना का आदान-प्रदान करने के लिए प्रणाली का डिजिटलीकरण किया जा रहा है। जिसमे पुलिस, फोरेंसिक, कारागार, चिकित्सा और अभियोजन को एक साथ जोड़ने का प्रावधान है।
उक्त न्यायिक निर्णयों एवं भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के आधार पर ‘अभियान समन्वय’ के माध्यम से कार्यालय संयुक्त निदेशक विधि, देहरादून द्वारा विवेचना की समीक्षा कर त्रुटि पूर्ण विवेचना की त्रुटियों का निराकरण करने हेतु संबंधित विवेचक को द्वारा उचित माध्यम से पत्रवलियों को प्रेषित करना है। जिससे कि सुसंगत और ग्राह्य साक्ष्यों का संकलन किया जा सके।
‘अभियान समन्वय’ के अंतर्गत निम्न चरण संपादित किए जाएंगेः-
- 1- प्रथम चरण- पुलिस विभाग से समन्वय स्थापित कर विवेचना की त्रुटियों का निराकरण।
2- द्वितीय चरण – पुलिस विभाग के साथ absentia inquiry trial (अभियुक्त की अनुपस्थिति मे जाँच व विचारण) और दो स्थगन के संबंध मे समन्वय स्थापित करना ।
3- तृतीय चरण- पुलिस थाना के साथ समन्वय स्थापित कर अभियुक्त के रिमान्ड व जमानत आख्या का परिशीलन।
4- चतुर्थ चरण- राज्य के अन्य विभागों से समन्वय स्थापित कर अभियोजन हेतु परिवाद तैयार करने एवं अपराध के निवारण के संबंध में विचार – विमर्श । - उपरोक्त समन्वय हेतु जिला अभियोजन निदेशालय से बनाई गई ब्रीफ़ पर संबंधित विवेचक /थानाध्यक्ष / क्षेत्राधिकारी आदि के सुझाव भी फीडबैक फॉर्म के माध्यम से प्राप्त किए जाएंगे। जिनमे सुझाव व समस्याओं का निराकरण, जो जिला स्तर पर संभव है, किया जाएगा। अन्यथा पुलिस मुख्यालय व अभियोजन निदेशालय के माध्यम से उक्त समस्याओं का निराकरण किया जाएगा। जिससे जहाँ एक ओर यह अभियान आपसी सामंजस्य स्थापित करेगा, वही दूसरी ओर माननीय न्यायालयों के निर्णय का भी अनुपालन करना सुनिश्चित होगा।




