दीप मैठाणी ✍️NIU
ऑनलाइन शॉपिंग ने छोटे दुकानदारों का बाजार लगभग समाप्त कर दिया है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अब तीज-त्योहारों के दौरान भी लोग पारंपरिक बाजारों की बजाय ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स को प्राथमिकता दे रहे हैं। आकर्षक डिस्काउंट, कैशबैक और त्वरित डिलीवरी के लालच में ग्राहक स्थानीय दुकानों से मुंह फेर लेते हैं। नतीजा? छोटे दुकानदार बेरोजगार हो रहे हैं, और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर गहरा संकट मंडरा रहा है। सबसे बड़ा खतरा तो क्विक कॉमर्स ऐप्स जैसे ब्लिंकिट हैं, जिन्होंने 10-15 मिनट की डिलीवरी के दम पर छोटे रिटेलर्स को बाजार से बाहर कर दिया।
पिछले कुछ वर्षों में अमेज़न, फ्लिपकार्ट और मीशो जैसे प्लेटफॉर्म्स ने बाजार पर कब्जा जमा लिया। त्योहारों जैसे दीवाली, होली या रक्षाबंधन पर ये कंपनियां भारी छूट देती हैं जैसे 70% तक डिस्काउंट या ‘बाय वन, गेट वन’ ऑफर। ग्राहक सोचते हैं, घर बैठे सामान आ जाएगा, क्यों परेशान हों? लेकिन यह सुविधा छोटे दुकानदारों के लिए अभिशाप साबित हो रही है।
उदाहरण के लिए, दिल्ली-एनसीआर में एक सर्वे के अनुसार, 2025 की दीवाली पर ऑनलाइन सेल्स 40% बढ़ीं, जबकि स्थानीय बाजारों में 30% गिरावट आई। ग्रामीण क्षेत्रों में भी यही हाल है, उत्तराखंड के छोटे कस्बों में दुकानें बंद हो रही हैं। लोग अब मोबाइल से ऑर्डर करते हैं, न कि बाजार घूमने जाते हैं।
ब्लिंकिट जैसी क्विक कॉमर्स कंपनियां इस समस्या की जड़ हैं। इनके अपने डार्क स्टोर्स (छोटे वेयरहाउस) से 10 मिनट में सामान पहुंच जाता है दूध, सब्जी से लेकर त्योहारी मिठाई तक। स्थानीय किराना स्टोर अब खाली पड़े हैं, क्योंकि ग्राहक तुरंत डिलीवरी चाहते हैं।
कंपनियों का मॉडल सस्ते दामों पर टिका है बल्क खरीद, कम मार्जिन और निवेशकों का पैसा, लेकिन छोटे दुकानदार इनसे मुकाबला नहीं कर पाते, एक रिपोर्ट के मुताबिक, ब्लिंकिट ने भारत में 2 लाख से अधिक छोटे रिटेलर्स को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप, बेरोजगारी बढ़ रही है, खासकर युवा और महिलाओं के बीच, जो इन दुकानों पर निर्भर थे।
छोटे दुकानदारों की आय 50-70% घटी है, कई कर्ज में डूब रहें हैं,
लाखों नौकरियां गईं, स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर हुई,
बाजारों की रौनक गायब है, त्योहारों में खरीदारी का मजा खत्म होता जा रहा है,
ऑनलाइन सामान अक्सर घटिया या एक्सपायरी डेट वाला मिलता है, लेकिन शिकायत का कोई आसान रास्ता नहीं।
सरकार और समाज को अब कार्रवाई करनी होगी,
क्विक कॉमर्स पर डिलीवरी फीस और डिस्काउंट पर टैक्स लगाएं। ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को सशक्त बनाएं।
छोटे दुकानदारों को ‘ऑनलाइन बाजार’ ऐप्स से जोड़ें, जहां वे खुद डिलीवरी दें।
सोशल मीडिया पर कैंपेन चलाएं,’स्थानीय खरीदो, स्थानीय बचाओ’। त्योहारों पर बाजारों में विशेष इवेंट आयोजित करें।
ब्लिंकिट जैसी कंपनियां स्थानीय दुकानों से पार्टनरशिप करें, न कि प्रतिस्पर्धा।
ऑनलाइन शॉपिंग सुविधाजनक है, लेकिन यह छोटे दुकानदारों का गला घोंट रही है, त्योहारों की चमक अब स्क्रीन पर सिमट गई है, अगर हमने अभी नहीं संभाला, तो पारंपरिक बाजार इतिहास के पन्नों में सिमट जाएंगे, आइए, जागरूक बनें,अगले त्योहार पर स्थानीय दुकान से खरीदारी करें, यह न केवल दुकानदार बचाएगा, बल्कि हमारी संस्कृति को भी।

