
देहरादून NIU ✍️संयुक्त परिवार से एकल परिवारों तक पालन-पोषण कभी आसान नहीं रहा, लेकिन आज की तेज़ी से बदलती दुनिया में, माता-पिता की भूमिका और ज़िम्मेदारी पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है। पिछली पीढ़ियों में, बच्चों का पालन-पोषण सिर्फ़ माता-पिता की ज़िम्मेदारी नहीं थी—संयुक्त परिवारों में इसे दादा-दादी, चाचा-चाची और यहाँ तक कि बड़े भाई-बहन भी साझा करते थे। बच्चे का मार्गदर्शन और पालन-पोषण करने में परिवार के हर सदस्य की भूमिका होती थी। लेकिन अब परिवारों का ढाँचा तेज़ी से बदल रहा है। एकल परिवारों की संख्या बढ़ रही है, जहाँ माता-पिता दोनों कामकाजी होते हैं और यहाँ तक कि एकल-अभिभावक वाले परिवारों के साथ, पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी अब ज़्यादातर एक या दो व्यक्तियों के कंधों पर आ जाती है। इसीलिए आज पैरेंटिंग केवल बच्चे को बड़ा करने का काम नहीं रह गया है, बल्कि एक पूरे व्यक्तित्व को आकार देने की प्रक्रिया बन गई है। माता-पिता की भूमिका सिर्फ़ बुनियादी ज़रूरतों जैसे भोजन, कपड़े और शिक्षा तक सीमित नहीं है। इसमें बच्चों को भावनात्मक सुरक्षा, नैतिक मार्गदर्शन, सामाजिक समझ, अवसरों का अनुभव, और सबसे महत्वपूर्ण—उनके सपनों का साथ देना भी शामिल है। हर बच्चा एक अनोखा व्यक्तित्व है, सिर्फ़ किसी का बेटा या बेटी नहीं। माता-पिता को यह समझना होगा कि बच्चे की अपनी अलग पहचान, सोच, चुनाव और आकांक्षाएँ होती हैं। जब माता-पिता उन्हें गरिमा के साथ देखते हैं, उनकी राय का सम्मान करते हैं और उनके सपनों की क़द्र करते हैं, तभी बच्चे आत्मविश्वासी, दयालु और संतुलित इंसान बन पाते हैं।
भारतीय परिवारों में सबसे आम गलती यह देखी जाती है कि बच्चों पर उम्मीदों का बोझ डाल दिया जाता है। कई माता-पिता अनजाने में अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाएँ बच्चों पर थोप देते हैं—उन्हें ऐसे करियर या जीवनशैली की ओर धकेलते हैं, जिसमें उनकी रुचि ही नहीं होती। यह न सिर्फ़ बच्चों को उनकी वास्तविक रुचियों से दूर कर देता है, बल्कि धीरे-धीरे उन्हें परिवार, दोस्तों, समाज और जीवन की खुशी से भी काट देता है। नतीजा यह होता है कि बच्चे हताशा, अपराधबोध और असफलता की भावना से जूझने लगते हैं। गंभीर हालात में यह दबाव उन्हें चिंता (anxiety), अवसाद (depression) या आत्महत्या जैसे खतरनाक कदमों तक ले जा सकता है।
आधुनिक माता-पिता पुराने तरीक़ों को ज्यों का त्यों नहीं अपना सकते लेकिन साथ ही उन्हें अपनी सांस्कृतिक धरोहर—बड़ों का सम्मान, मज़बूत पारिवारिक सम्बन्ध और मूल्य-आधारित परवरिश—को भी नहीं छोड़ना चाहिए। असली कला इसी में है कि हम अपनी पैरेंटिंग शैली को समय के हिसाब से ढालें और साथ ही अपनी जड़ों से जुड़े रहें। इसी संतुलन को पाने के लिए माता-पिता कुछ छोटे-छोटे कदम उठा सकते हैं, जो बच्चों की परवरिश को और मज़बूत और सार्थक बनाते हैं:
परंपरा और आधुनिकता का संगम: बच्चों को पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियाँ सुनाएँ ताकि वे अपनी जड़ों को जानें, और साथ ही उन्हें सवाल पूछने और स्वतंत्र सोचने की आज़ादी दें। यही संतुलन उन्हें गहराई और आधुनिक दृष्टिकोण दोनों देगा।
गुणवत्ता वाला समय दें: दिन में केवल एक घंटा भी मिले, तो पूरी तरह बच्चों को समर्पित करें। फ़ोन और व्यस्तता से दूर रहकर उनके साथ खेलें, बातें करें और ध्यान से सुनें—यही पल उनके दिल में हमेशा के लिए बस जाते हैं।
ज़िम्मेदारी सिखाएँ: संयुक्त परिवारों में बच्चे बड़ों को देखकर सीखते थे। अब माता-पिता को यह भूमिका निभानी होगी—घर के छोटे-छोटे काम देकर बच्चों को ज़िम्मेदारी का अनुभव कराएँ। इससे उनमें आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान दोनों विकसित होंगे।
जड़ों से जोड़ें: बच्चों को त्योहारों, परंपराओं और गाँव-घर के अनुभवों से परिचित कराएँ। यह उनमें पहचान और गर्व की भावना जगाने के साथ-साथ जीवन में अपनापन और स्थिरता भी लाता है।
पैरेंटिंग के नए तरीक़े अपनाएँ: आज की चुनौतियों के लिए पुराने तरीक़े पर्याप्त नहीं। जेंटल पैरेंटिंग, पॉज़िटिव डिसिप्लिन और खुली बातचीत जैसे आधुनिक दृष्टिकोण अपनाएँ। इससे बच्चे साथियों के दबाव और मानसिक कठिनाइयों से बेहतर तरीके से निपट पाएँगे।
व्यक्तित्व का सम्मान करें: हर बच्चा अपनी सोच, पसंद और सपनों के साथ अलग होता है। उसे अपनी राह खोजने और अपनाने की आज़ादी दें—यही आज़ादी उसे आत्मविश्वासी, संतुलित और खुशहाल बनाएगी।
खुलकर बातचीत करें: बच्चों की बातें बिना जज किए सुनें। जब वे महसूस करते हैं कि उन्हें सचमुच सुना जा रहा है, तो वे अपनी परेशानियाँ छिपाते नहीं बल्कि भरोसे से साझा करते हैं।
मार्गदर्शन और स्वतंत्रता का संतुलन रखें: बच्चों को मूल्य और दिशा दें, लेकिन साथ ही उन्हें निर्णय लेने और अपनी गलतियों से सीखने का अवसर भी दें। यही संतुलन उन्हें समझदार और मजबूत बनाता है।
तुलना से बचें: हर बच्चा अपनी गति और प्रतिभा के हिसाब से बढ़ता है। दूसरों से तुलना केवल आत्मविश्वास को चोट पहुँचाती है—इसलिए उसकी प्रगति की तुलना केवल उसकी पिछली उपलब्धियों से करें।
मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें: भावनाओं और मन की उलझनों पर सहजता से बात करें। बच्चों को सिखाएँ कि संघर्ष जीवन का हिस्सा हैं, और ज़रूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना उतना ही सामान्य है जितना किसी शारीरिक बीमारी में डॉक्टर से सलाह लेना।
मां बाप की असली सफलता क्या है?
पैरेंटिंग का लक्ष्य किसी “परफ़ेक्ट बच्चा” बनाना नहीं, बल्कि ऐसा माहौल तैयार करना है जहाँ बच्चा सुरक्षित महसूस करे, खुद को क़ीमती समझे और अपनी क्षमताओं को निखार सके। जब हम परंपराओं की जड़ों को आधुनिक समझ के साथ जोड़ते हैं, तब हम ऐसे बच्चों का निर्माण करते हैं जो केवल सफल ही नहीं, बल्कि संवेदनशील, मज़बूत और मूल्यों से जुड़े हुए इंसान भी बनते हैं।
सच्ची सफलता तब होती है जब बच्चा बड़ा होकर यह महसूस करे कि उसे एक अलग इंसान के रूप में सम्मान मिला है—सिर्फ़ माता-पिता के सपनों को पूरा करने वाला नहीं, बल्कि अपनी राह चुनने वाला। ऐसे बच्चे वयस्क होकर खुद का सम्मान करना सीखते हैं और दूसरों की गरिमा को भी समझते हैं। यही है पैरेंटिंग की असली जीत।