दीप मैठाणी NIU ✍️ उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के अध्यक्ष बॉबी पंवार ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर आरोप लगाया कि जौनसार–बावर क्षेत्र के कालसी (हरिपुर) में जनजातीय क्षेत्र की जमीन एक कश्मीर निवासी गुलाम अली ने फर्जी कागज़ात के आधार पर खरीदी है। पंवार ने दो ऐसे वीडियो सामने आने की बात कही जो पाकिस्तान से जारी बताए जा रहे हैं, जिनमें कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि हरिपुर कालसी की यह जमीन उनके पूर्वजों की है, जिससे पूरे प्रकरण में सीमा-पार एंगल होने से ये और भी संवेदनशील हो गया है।
जौनसार संविधान सूचीबद्ध जनजातीय क्षेत्र की संवेदनशील पट्टी है, जहां जमीन के हस्तांतरण पर पहले से ही विशेष प्रतिबंध और प्रक्रियाएं लागू हैं। दूसरी ओर, उत्तराखंड सरकार हाल ही में सख्त भू-कानून लागू करने का राजनीतिक दावा कर रही है, जिसमें बाहरी लोगों द्वारा कृषि भूमि खरीद पर बड़े पैमाने पर रोक, और गैर-निवासियों के लिए सीमित क्षेत्र तक ही रिहायशी खरीद की अनुमति जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। ऐसे में यदि जनजातीय क्षेत्र की 10 बीघा भूमि किसी बाहरी व्यक्ति के नाम चली जाती है, तो यह न सिर्फ स्थानीय समुदाय के अधिकारों पर चोट है, बल्कि खुद सरकार की भू-कानून लागू करने की क्षमता और ईमानदारी पर भी सीधा सवाल उठाती है।
मोर्चा अध्यक्ष बॉबी पंवार के मुताबिक, जिस व्यक्ति के नाम जमीन खरीदी गई है वह पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस में कर्मचारी रह चुका है किसी आतंकी हमले में उसकी संदिग्ध भूमिका पाए जाने पर उसे बर्खास्त भी किया गया था, उस पर आरोप है कि वह अवैध या संदिग्ध धन को उत्तराखंड में खनन क्रशरों और अलग-अलग प्रॉपर्टी डील्स में लगा रहा है।
आरोप यह भी है कि यह पूरा खेल कुछ स्थानीय नेताओं, भू-माफियाओं और भ्रष्ट अफ़सरों की मिलीभगत से चल रहा है, जिसने जनजातीय क्षेत्र को नई तरह की ‘मनी लॉन्डरिंग लैब’ में बदलने की कोशिश की है।
पाकिस्तान से समर्थन वाले वीडियो सामने आने के बाद यह आशंका स्वाभाविक रूप से उठती है कि क्या जमीन में लग रहा पैसा सीमा-पार स्रोतों या आतंकी नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है, लेकिन अभी तक उपलब्ध सूचनाओं के स्तर पर इसे तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता।
सीमा-पार समर्थक वीडियो और संदिग्ध वित्तीय लेनदेन राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों द्वारा ‘रेड फ्लैग’ के रूप में लिए जाने चाहिए और एनआईए/ईडी जैसी जांच एजेंसियों को सोर्स ऑफ फंड की फोरेंसिक जांच करनी चाहिए।
जब तक आधिकारिक जांच रिपोर्ट यह न साबित कर दे कि धन का स्रोत पाकिस्तान या किसी आतंकी गुट से जुड़ा है, तब तक पत्रकारिता और जनचर्चा में इसे ‘संभावित जोखिम’ या ‘जांच योग्य आशंका’ के रूप में ही बताया जाना चाहिए, न कि पक्के निष्कर्ष के रूप में।
2015 से 2025 के बीच राज्य में लगातार इस बात पर चर्चा रही कि बाहरी पूंजी पहाड़ की जमीन को बड़े पैमाने पर खरीद कर जनसंख्या संरचना, संस्कृति और संसाधनों पर कब्ज़ा कर रही है, इसी पृष्ठभूमि में नया भू-कानून लाया गया जो बाहर के लोगों की खरीद पर सख्त लिमिट और जांच व्यवस्था लागू करता है। नए कानून के बावजूद जनजातीय क्षेत्र की 10 बीघा जमीन पर विवादित खरीद दिखाती है कि या तो कागज़ों में हेरफेर कर सुराख़ निकाला गया, या फिर जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों ने जानबूझकर आंखें मूंद लीं, दोनों ही स्थितियां भू-माफियाओं के लिए खुला निमंत्रण हैं।
ऐसे मामलों में ज़िम्मेदारी तीन स्तरों पर बनती है: राजस्व और रजिस्ट्रेशन विभाग की, जो यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं कि जनजातीय क्षेत्र की भूमि का हस्तांतरण नियमों के विरुद्ध न हो, यदि फर्जी दस्तावेज़ से रजिस्ट्री हुई है तो सम्बंधित लेखपाल, पटवारी, रजिस्ट्रार और एसडीएम तक की भूमिका जांच के घेरे में आनी चाहिए।
स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व, जिन पर आरोप है कि उन्होंने कमीशन और वोट-बैंक की राजनीति के लिए जनजातीय हितों की सुरक्षा की शर्तों को नज़रअंदाज़ किया।
राज्य सरकार की, जो भू-कानून को अपनी उपलब्धि बताती है, पर जमीनी स्तर पर न तो प्रभावी मॉनिटरिंग दिखती है और न ही ऐसे मामलों पर त्वरित कठोर कार्रवाई का उदाहरण कहीं नजर आता है।
जौनसार की भूमि सिर्फ आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि वहां के जनजातीय समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक आत्मा है, बाहरी और संदिग्ध निवेश से स्थानीय लोग अपने ही गांवों में किराएदार बनने के खतरे की ओर धकेले जा सकते हैं। पाकिस्तान समर्थक वीडियो जैसे तत्व सामाजिक ध्रुवीकरण और सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ा सकते हैं, जिसका फायदा अक्सर वही माफिया उठाते हैं जो जमीन, खनन और कालेधन के खेल को धर्म और पहचान की आड़ में छिपाना चाहते हैं।
इस 10 बीघा जमीन की खरीद, दस्तावेज़ों और राजस्व अभिलेखों की हाई-लेवल ज्यूडिशियल/एसआईटी जांच, हो ताकि यह साफ हो सके कि किस स्तर पर कानून तोड़ा गया।एनआईए, ईडी और इंटेलिजेंस एजेंसियों द्वारा पैसे के स्रोत, बैंकिंग चैनल, शेल कंपनियों और क्रशर इकाइयों तक की वित्तीय ट्रेल की जांच की जाए, ताकि यह तय हो सके कि मामला केवल टैक्स चोरी/मनी लॉन्डरिंग का है या राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा है।
जनजातीय क्षेत्रों में भू-कानून के विशेष प्रावधान, डिजिटल भूमि रिकॉर्ड और पारदर्शी ऑनलाइन अनुमति प्रणाली, जिससे राजनीतिक-सांठगांठ और फर्जीवाड़े की गुंजाइश घटे।




