दीप मैठाणी, संपादक NIU✍️ देहरादून में अवैध प्लॉटिंग और भूमाफियाओं का जाल लगातार फैलता जा रहा है। शहर के बीचों-बीच जिस तरह पहले बेशकीमती जमीनों पर अवैध कब्जे, फर्जी दस्तावेज़ और नियमों को ताक पर रखकर प्लॉटिंग की शिकायतें सामने आती रही हैं, अब वही खेल तेजी से देहात के इलाकों की ओर खिसकता दिखाई दे रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि एक ही भूखंड को कई लोगों को बेचने जैसे मामलों ने आम नागरिकों की मेहनत की कमाई को सीधे खतरे में डाल दिया है।
प्रशासन समय-समय पर सख्ती, कार्रवाई और अभियान चलाने के दावे करता रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह सवाल खड़ा करती है कि जब यह सब प्रशासन के “नाक के नीचे” हो रहा है, तो फिर ऐसे गिरोहों पर पूरी तरह अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा? पूर्व में देहरादून पुलिस द्वारा ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए जमीनों की धोखाधड़ी से जुड़े कई नामी वकीलों को गिरफ्तार भी किया गया था लेकिन चंद दिनों बाद उन्हें जमानत मिल गई, नतीजा वही ढाक के तीन पात, पूर्व में हमने आपको खबरें भी दिखाई थी जिसमें हमने रायपुर स्थित औली जमीन का जिक्र किया था साथ ही थानों गांव में एक गरीब किसान को किस तरह प्रताड़ित किया जा रहा है वह भी दिखाया था कई अन्य ऐसे मामले हमने आपको अपनी वीडियो रिपोर्ट में दिखाए जिसमें पीडि़त न्याय के लिए आज तक भटक रहे हैं परंतु उन्हें न्याय नहीं मिल पाया।

शहर के भीतर जमीनों की कीमतें बढ़ने के साथ भूमाफियाओं ने अब देहात और बाहरी इलाकों को अपना नया ठिकाना बना लिया है। जहां अपेक्षाकृत सस्ती जमीनें उपलब्ध हैं, वहीं लोगों को सुनहरे सपने दिखाकर अवैध कॉलोनियां काटी जा रही हैं। नक्शे, लेआउट, रजिस्ट्री और सड़क, पानी, बिजली जैसी सुविधाओं के नाम पर खरीदारों को भरोसा दिलाया जाता है, जबकि वास्तविकता यह होती है कि कई बार जमीन का स्वामित्व ही संदिग्ध होता है।
सबसे बड़ा फरेब यह है कि एक ही प्लॉट को अलग-अलग लोगों को बेच दिया जाता है। कुछ मामलों में तो कागज़ों पर ऐसी जालसाज़ी की जाती है कि खरीदार को काफी समय तक असली स्थिति का अंदाज़ा ही नहीं लग पाता। जब विवाद सामने आता है, तब तक न केवल पैसे डूब चुके होते हैं, बल्कि मुकदमेबाज़ी, पुलिस रिपोर्ट और कोर्ट-कचहरी का लंबा सिलसिला शुरू हो जाता है, और पुलिस सिविल का मामला बता कर पल्ला झाड़ लेती है।
देहरादून जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में यह समस्या इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यहां बाहर से आने वाले लोग, नौकरीपेशा परिवार और मध्यमवर्गीय खरीदार अक्सर जमीन खरीदने को सुरक्षित निवेश मानते हैं। हालिया धोंलास जमीन प्रकरण इसका जीता जागता उदाहरण मौजूद है, बिना समुचित जांच-पड़ताल के की गई खरीदारी उन्हें जीवनभर की परेशानी में डाल सकती है। कई बार खरीदार केवल दलालों के भरोसे जमीन ले लेते हैं और बाद में पता चलता है कि वह भूमि कृषि, वन, सरकारी या विवादित श्रेणी में दर्ज थी।

सूत्रों की मानें तो इन भूमाफियाओं के फलने फूलने का एक बड़ा कारण राजनीतिक संरक्षण भी कहा जा सकता है, कई विधायकों और मंत्रियों के खास लोग कानून को ठेंगा दिखाते हुए यह काम खुलेआम कर रहे हैं, इनकी ठगी का शिकार बने लोगों को यह खुलेआम धमकाते हुए नजर आते हैं और शिकायत किए जाने पर जानलेवा धमकियां तक दी जाती है।
वहीं प्रशासन की ओर से अवैध निर्माण और अनधिकृत प्लॉटिंग के खिलाफ अभियान चलाने के दावे किए जाते हैं, कई मामलों में MDDA द्वारा कड़ी कार्यवाही करते हुए प्लाटिंग ध्वस्त भी की गई हैं, लेकिन सवाल यही है कि फिर यह गतिविधियां लगातार फल-फूल कैसे रही हैं। अगर जिला प्रशासन, नगर निकाय, राजस्व विभाग और पुलिस तंत्र मिलकर समन्वय से काम करें तो ऐसे मामलों को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता है। परंतु कई बार कार्रवाई केवल शिकायत आने के बाद या मीडिया में मामला उछलने पर होती है, और कई बार तो मामला सार्वजनिक हो जाने के बावजूद कुछ अधिकारी सांठ गांठ कर फाइल ही दबा कर बैठ जाते हैं और पीड़ितों को न्याय के लिए चक्कर लगवाने पर मजबूर कर देते हैं और इस प्रक्रिया में कई सालों का समय लग जाता है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि भूमाफिया कई बार इतने संगठित तरीके से काम करते हैं कि उन्हें कुछ प्रभावशाली लोगों का संरक्षण भी मिलता है। यही कारण है कि नियमों की अनदेखी करके कॉलोनियां बसाने का सिलसिला चलता रहता है। ज़मीन की खरीद-फरोख्त में पारदर्शिता की कमी, रिकॉर्ड्स की कमजोर जांच और सख्त निगरानी के अभाव में यह अवैध कारोबार मजबूत होता जा रहा है।

शहर के भीतर जांच और सख्ती बढ़ने के बाद अब अवैध प्लॉटिंग का रुख देहात की ओर बढ़ रहा है। यह एक खतरनाक संकेत है। देहात के इलाकों में अक्सर लोग जमीन के कानूनी पहलुओं से उतने परिचित नहीं होते, जिससे उन्हें ठगना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। कई जगहों पर खेतों को टुकड़ों में काटकर बिना विकास प्राधिकरण की अनुमति के प्लॉट बेचे जा रहे हैं।
ऐसी कॉलोनियों में न तो पर्याप्त सड़क होती है, न सीवरेज, न पार्किंग, न ही बुनियादी ढांचा। बाद में यही कॉलोनियां जलभराव, ट्रैफिक जाम, पेयजल संकट और विवादों का कारण बनती हैं। यदि समय रहते रोक नहीं लगी, तो आने वाले वर्षों में देहरादून के आसपास के ग्रामीण क्षेत्र भी अनियोजित शहरीकरण की भेंट चढ़ सकते हैं।
भूमि खरीदने से पहले खरीदारों को बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। केवल सस्ती कीमत या आकर्षक लोकेशन देखकर फैसला करना भारी नुकसान का कारण बन सकता है। भूमि से जुड़े दस्तावेज़, खसरा-खतौनी, स्वामित्व, रिकॉर्ड, मानचित्र और अनुमति पत्र की जांच बेहद जरूरी है। अगर किसी प्लॉट को लेकर पारदर्शिता नहीं है, तो उससे दूरी बनाना ही समझदारी है, अपनी समझ का इस्तेमाल करें और जांच पड़ताल कर विश्वसनीय बिल्डर डेवलपर या प्रॉपर्टी डीलर से ही विक्रय अनुबंध करें।
इस समस्या का स्थायी समाधान केवल औपचारिक बयानों से नहीं होगा। प्रशासन को चाहिए कि वह:
- अवैध प्लॉटिंग की रियल-टाइम निगरानी करें।
- राजस्व, नगर निगम और पुलिस के बीच संयुक्त जांच व्यवस्था बनाएं।
- फर्जी रजिस्ट्री और एक ही जमीन की कई बिक्री पर कड़ी आपराधिक कार्रवाई करें।
- देहात क्षेत्रों में जनजागरूकता अभियान चलाएं।
- भूमि रिकॉर्ड को अधिक पारदर्शी और डिजिटल रूप से सुलभ बनाएं।
देहरादून में भूमाफियाओं का यह जाल केवल जमीन की खरीद-फरोख्त का मामला नहीं, बल्कि आम नागरिकों के भरोसे, उनकी बचत और प्रशासनिक विश्वसनीयता की भी परीक्षा है। जब तक इस पर कठोर और निरंतर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक “सख्ती” के दावे कागज़ों तक ही सीमित रहेंगे और जमीनी खेल बेरोकटोक चलता रहेगा।
ग्राहकों के लिए जरूरी सलाह:
- जमीन खरीदने से पहले खसरा-खतौनी, रजिस्ट्री और नक्शा की जांच करवाएँ।
विकास प्राधिकरण या तहसील से अनुमति पत्र की पुष्टि करें।
एक ही प्लॉट की दोहरी बिक्री से बचें, रिकॉर्ड ऑनलाइन चेक करें।
दलालों के भरोसे न रहें, वकील या एक्सपर्ट से सलाह लें।
संदेह हो तो प्रशासनिक हेल्पलाइन पर शिकायत करें।
सुरक्षित निवेश ही सच्चा निवेश.




