Site icon News India Update

उत्तरकाशी के पारंपरिक लोकगीत ‘राधा रुक्मणी’ को मिला आधुनिक संगीत का नया रंग, लोकगायिका श्रद्धा कुहुप्रिया की अनूठी पहल। NIU

उत्तरकाशी के पारंपरिक लोकगीत ‘राधा रुक्मणी’ को मिला आधुनिक संगीत का नया रंग, लोकगायिका श्रद्धा कुहुप्रिया की अनूठी पहल। NIU

देहरादून ✍️NIU
पारंपरिक छोड़ा-पवाड़ा शैली के गीत को फोक और वेस्टर्न म्यूजिक के फ्यूजन के साथ किया प्रस्तुत, यमुना घाटी से भागीरथी घाटी तक की लोकसंस्कृति को फिर से जीवंत करने का प्रयास।

उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंगीत परंपरा को आधुनिक संगीत के साथ जोड़ने की दिशा में लोकगायिका श्रद्धा कुहुप्रिया ने अपने नए गीत ‘राधा रुक्मणी’ के माध्यम से एक अनूठी पहल की है। उत्तरकाशी की पारंपरिक लोकधुन और लोकशैली पर आधारित यह गीत छोड़ा-पवाड़ा शैली का एक पुराना लोकगीत है, जिसे यमुना घाटी से लेकर भागीरथी घाटी तक गाया जाता रहा है। इस गीत के बोलों में गढ़वाली के साथ-साथ रवांई-बंगाण क्षेत्र की स्थानीय बोली और शब्दों की भी खूबसूरत झलक मिलती है।

श्रद्धा कुहुप्रिया का इस गीत से जुड़ाव बेहद व्यक्तिगत और भावनात्मक है। वह बताती हैं कि उन्होंने बचपन में यह गीत अपनी मां से सुना था। उनकी मां जब उत्तरकाशी में रहती थीं, तब उनके स्कूल में इस गीत पर नृत्य प्रस्तुत किया जाता था। इस तरह यह गीत उनके लिए केवल एक लोकधुन नहीं, बल्कि बचपन की यादों, अपनी मिट्टी और उत्तरकाशी की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा हुआ है।

वह बताती हैं कि इस पारंपरिक गीत को समय-समय पर कई लोक कलाकारों ने अपनी-अपनी शैली में गाया है। अलग-अलग प्रस्तुतियों में इसकी धुन और शब्दों में भी बदलाव तथा विस्तार देखने को मिला है। हालांकि, इस प्रस्तुति में उन्होंने गीत की पारंपरिक धुन और मूल शब्दों को यथासंभव उसी स्वरूप में बनाए रखने का प्रयास किया है।

श्रद्धा कहती हैं कि आज के व्यावसायिक संगीत के दौर में जहां नए गीतों का निर्माण अक्सर डीजे और डांस बीट्स को ध्यान में रखकर किया जाता है, वहीं उन्हें महसूस हुआ कि उत्तरकाशी के ऐसे पुराने लोकगीतों को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाना बेहद जरूरी है, जिन पर कभी गांवों और स्कूलों में लोग पूरे उत्साह से थिरका करते थे। इसी सोच के साथ उन्होंने ‘राधा रुक्मणी’ को एक नए संगीत संयोजन में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।

इस गीत की खासियत इसका पारंपरिक और आधुनिक संगीत का संगम है। मूल लोक गायकी और पारंपरिक धुन को बरकरार रखते हुए इसमें टेनर बैंजो और इलेक्ट्रिक गिटार जैसे आधुनिक वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया गया है। इसके अलावा फोक वोकल्स के साथ वेस्टर्न वोकल हमिंग को भी शामिल किया गया है, जिससे गीत को एक नया और रचनात्मक संगीतात्मक विस्तार मिलता है। इस तरह गीत की मूल आत्मा को सुरक्षित रखते हुए उसे समकालीन संगीत का एक नया स्वरूप देने की कोशिश की गई है।


श्रद्धा कुहुप्रिया का मानना है कि लोकसंगीत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान है, जिसे समय के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है। वह कहती हैं कि जब सोशल मीडिया पर लोग ‘राधा रुक्मणी’ सुनकर यह प्रतिक्रिया देते हैं कि उन्होंने यह गीत बचपन में सुना है, यह उत्तरकाशी का पुराना गीत है या वे स्कूल में इस पर नृत्य प्रस्तुत किया करते थे, तो उन्हें बेहद खुशी होती है। उनके लिए यही प्रतिक्रियाएं इस प्रयास की सबसे बड़ी सफलता हैं।

‘राधा रुक्मणी’ के माध्यम से श्रद्धा कुहुप्रिया ने न केवल उत्तरकाशी की एक पुरानी लोकधुन को नए श्रोताओं तक पहुंचाने का प्रयास किया है, बल्कि यह संदेश भी दिया है कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सही संगीत संयोजन और संवेदनशील प्रस्तुति के साथ हमारी पारंपरिक लोकविरासत को आज के दौर में भी उतनी ही खूबसूरती से जीवंत रखा जा सकता है।

Singer – Shraddha Kuhupriya Music – Haider Ali
Mix mastering – Dev basak
Video director- Raunak Raut
DOP – Vazeer
Choreographer Aashish bora

Exit mobile version