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पूरा हो रहा राज्यपाल रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह का कार्यकाल, कौन होगा उत्तराधिकारी? या बढ़ाया जाएगा कार्यकाल? । NIU

पूरा हो रहा राज्यपाल रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह का कार्यकाल, कौन होगा उत्तराधिकारी? या बढ़ाया जाएगा कार्यकाल? । NIU

दीप मैठाणी ✍️NIU उत्तराखंड के राज्यपाल रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह का कार्यकाल 15 सितंबर 2026 यानी की कल पूरा हो रहा है। इससे ठीक पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आज 11:15 बजे राजभवन में उनसे मुलाकात की और मुलाकात के बाद राज्यपाल दिल्ली रवाना होंगे। फिलहाल, अगले आदेश तक गुरमीत सिंह ही राज्यपाल के पद पर बने रहेंगे।

अपने इस कार्यकाल में गुरमीत सिंह की छवि एक शालीन, संयमित और संस्थागत मर्यादा बनाए रखने वाले राज्यपाल के रूप में उभरी है। सेना पृष्ठभूमि से आने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी के तौर पर उनका अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रीय सुरक्षा का नजरिया देवभूमि की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक पहचान के साथ मिलकर एक खास तरह की ‘उच्च विचार’ वाली छवि गढ़ता है।

गुरमीत सिंह ने 15 सितंबर 2021 को उत्तराखंड के आठवें राज्यपाल के रूप में शपथ ली थी और तब से वे देवभूमि के सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नियमित दिखाई दिए हैं, राजभवन के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों से लेकर उच्च अधिकारियों तक उन्होंने व्यक्तिगत रूप से सभी का हाल चाल जाना है, किसी को जरूरत पड़ने पर जनरल मददगार भी साबित हुए हैं।

इसी तरह, लद्दाख के छात्रों के ‘राष्ट्रीय एकीकरण यात्रा’ दल से राजभवन में मिलकर उन्होंने युवाओं, राष्ट्रीय एकता और ‘सद्भावना’ जैसे मुद्दों पर संवाद किया। यह कदम देवभूमि की उस परंपरा के अनुरूप है जहां पहाड़, मठ-मंदिर और सीमांत क्षेत्रों के बीच एक भावनात्मक-राष्ट्रीय सेतु हमेशा रहा है।
‘सहकारिता में सहकार’ जैसे सामुदायिक कार्यक्रमों में राज्यपाल और मुख्यमंत्री का एक साथ मंच पर दिखना भी इस बात का संकेत रहा है कि संवैधानिक पद और निर्वाचित सरकार के बीच औपचारिक सहयोग की रेखा बनी रही।

वहीं उत्तराखंड को ‘देवभूमि’ कहने के पीछे सिर्फ पहाड़ और नदियां नहीं, बल्कि ऋषिकेश-हरिद्वार की तप-भूमि, गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब की पावन यात्रा और चारधाम का आस्था-केंद्र होना भी है। गुरमीत सिंह का कार्यकाल ऐसे माहौल में बीता जहां धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन और सरकारी कार्यक्रम अक्सर एक-दूसरे के समानांतर चलते रहे हैं, सीएम पुष्कर सिंह धामी के मंचों पर सिख समुदाय की सराहना, रुद्रपुर के विकास और विरासत का जिक्र, और क्षेत्रीय समुदायों के योगदान को रेखांकित करना, ये सब उसी व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक ताने-बाने का हिस्सा हैं जिसमें राज्यपाल जैसे संवैधानिक प्रमुख की उपस्थिति प्रतीकात्मक महत्व रखती है।

इस संदर्भ में गुरमीत सिंह की छवि एक ऐसे राज्यपाल के रूप में उभरी है जो धर्म और आध्यात्म को राजनीति से ऊपर, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में देखते हैं,

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल के तौर पर गुरमीत सिंह की पृष्ठभूमि ही ‘उच्च विचार’ की ओर इशारा करती है, देशभक्ति, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, और सेवाभाव, राज्यपाल बनने के बाद भी उनकी सार्वजनिक छवि शालीन और संयमित रही, न तो वे अनावश्यक विवादों का हिस्सा बने, न ही उनकी भाषा या व्यवहार में आक्रामकता देखी गई।

देवभूमि जैसे संवेदनशील और आस्था-प्रधान क्षेत्र में राज्यपाल का पद केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक नैतिक-प्रतीकात्मक किरदार भी होता है। गुरमीत सिंह के मामले में यह किरदार एक ऐसे व्यक्ति के रूप में उभरा जो:

यह सब मिलकर एक ‘शालीन व उच्च विचार’ वाली छवि बनाता है, जो देवभूमि की आध्यात्मिक पहचान के साथ रचती बसती है…

अभी स्थिति यह है कि 15 सितंबर को औपचारिक रूप से उनका पांच साल का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, लेकिन अगले आदेश तक वे पद पर बने रह सकते हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री की मुलाकात और दिल्ली रवानगी को अगली नियुक्ति या व्यवस्था से जोड़कर देखा जा रहा है।

देवभूमि के लिए अगला सवाल सिर्फ नए राज्यपाल का नाम नहीं, बल्कि यह भी है कि आने वाला संवैधानिक प्रमुख देवभूमि की धर्म-आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के साथ कैसे तालमेल बिठाता है और इस लिहाज से गुरमीत सिंह का कार्यकाल एक आदर्श के रूप में सदैव याद रखा जाएगा।

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