Site icon News India Update

गैस डिलीवरी बॉय से ‘रंगदारी’ का आरोप: पत्रकारों पर मुकदमा या छिपी गैस एजेंसी की सच्चाई? । NIU

गैस डिलीवरी बॉय से ‘रंगदारी’ का आरोप: पत्रकारों पर मुकदमा या छिपी गैस एजेंसी की सच्चाई? । NIU

दीप मैठाणी ✍️देहरादून, हरिद्वार के कनखल थाना क्षेत्र में एक ऐसी घटना सामने आई है, जहां तीन व्यक्तियों पर गैस डिलीवरी बॉय अमृत कुमार से दिनदहाड़े 2 लाख रुपये की रंगदारी मांगने का आरोप लगा है। आरोपियों ने खुद को ‘पत्रकार’ बताते हुए बाइक की चाबी निकाल ली, गैस सिलेंडर की घटतोली का हवाला दिया और फिर उसके ऑफिस तक पीछा किया। पुलिस ने तीनों पर मुकदमा दर्ज कर लिया।

यह खबर सोशल मीडिया और स्थानीय चैनलों पर तेजी से वायरल हो गई, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ एक FIR के आधार पर पूरी कहानी मिर्च-मसाले के साथ परोसना उचित है?

सबसे पहले घटना के तथ्यों को समझें। पीड़ित अमृत कुमार के बयान के मुताबिक, आरोपी पहले रास्ते में उसे रोकते हैं, बाइक की चाबी निकाल लेते हैं और गैस सिलेंडर का वजन कराने की बात कहते हैं। जब परिचय पूछा तो खुद को पत्रकार बताते हुए धमकी देते हैं और ऑफिस तक पीछा करते हैं। यह सुनने में गंभीर लगता है, रंगदारी, धमकी और पत्रकारिता का दुरुपयोग।

लेकिन सवाल उठना लाजमी है: क्या गैस डिलीवरी बॉय बिना किसी वजह के ऐसे लोगों का शिकार हो गया? या पीछे कोई काला कारोबार छिपा है? डिलीवरी बॉय की ‘हैसियत’ और गैस एजेंसी का रोल…
सबसे बड़ा सवाल जो हर समझदार व्यक्ति के मन में आता है, वह यह है कि एक साधारण गैस डिलीवरी बॉय से 2 लाख रुपये कैसे मांगे जा सकते हैं? अमृत कुमार की मासिक आय शायद 15-20 हजार रुपये भी न हो। इतनी बड़ी रकम मांगना वह भी एक डिलीवरी बॉय से अव्यावहारिक लगता है। संभव है कि यह मांग गैस एजेंसी के मालिक से जुड़ी हो।

गैस एजेंसी वाले अक्सर पैसे वाले होते हैं और घटतोली या कालाबाजारी के मामले इनमें आम हैं। क्या आरोपियों ने पहले एजेंसी मालिक को निशाना बनाया और डिलीवरी बॉय को मोहरा बनाया गया? अगर एजेंसी पर कोई अनियमितता पकड़ी गई, तो मालिक ने डिलीवरी बॉय के जरिए मुकदमा दर्ज करवा दिया, ऐसा तो हो ही सकता है। देशभर में गैस सिलेंडरों की घटतोली की शिकायतें आती रहती हैं। उपभोक्ता आयोग में ऐसे हजारों केस लंबित हैं। अगर आरोपी वाकई पत्रकार थे, तो शायद वे किसी जांच या स्टिंग ऑपरेशन के सिलसिले में पहुंचे हों। बिना दोनों पक्षों की सुनवाई के FIR को ही खबर बना देना पत्रकारिता की आचार संहिता का उल्लंघन है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के दिशानिर्देश साफ कहते हैं की खबर में संतुलन जरूरी है, एकतरफा रिपोर्टिंग से बचें।
आजकल पत्रकारों पर झूठे मुकदमे लगवाना आम हो गया है। राजनीतिक दबाव, व्यापारिक हित या व्यक्तिगत दुश्मनी में FIR दर्ज कराना आसान है। याद कीजिए हाल के वर्षों में उत्तराखंड में ही पत्रकारों पर लैंड घोटाले, भ्रष्टाचार उजागर करने पर केस हुए हैं। कई बार FIR 4-5 दिनों में ही खारिज हो जाती है, लेकिन तब तक पत्रकार की छवि धूमिल हो चुकी होती है। सोशल मीडिया पर Fake News या Journalist Extortion जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगते हैं, बिना तहकीकात के।

यहां सवाल उठता है की क्या असली दुश्मन पत्रकार ही हैं? मीडिया में आंतरिक कलह बढ़ रही है। एक-दूसरे पर कीचड़ उछालना, बिना जांच के खबरें वायरल करना यह पत्रकारिता को कमजोर कर रहा है। अगर आरोपी फर्जी पत्रकार थे, तो कार्रवाई जायज। लेकिन अगर वे सच्चे थे और अनियमितता पकड़ने की कोशिश कर रहे थे, तो न्याय व्यवस्था को दोनों पक्ष सुनने चाहिए। CCTV फुटेज, गवाहों के बयान और सिलेंडरों का वजन ये सब जांच के दायरे में आना चाहिए।
यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है की गैस कालाबाजारी रोकनी है, तो उपभोक्ता संरक्षण और सख्त निगरानी जरूरी। लेकिन पत्रकारों को बदनाम करने के लिए FIR का दुरुपयोग न हो। मीडिया हाउसों को चाहिए कि वे अपनी आंतरिक जांच कमेटियां सक्रिय करें और फर्जी पत्रकारों को बाहर करें। पुलिस को भी FIR से पहले प्रारंभिक जांच अनिवार्य करनी चाहिए। अंततः, सच्चाई तभी सामने आएगी जब दोनों पक्षों की बात सुनी जाए। सिर्फ एक FIR पर मिर्च-मसाला लगाकर परोसना लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर करता है। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में, जहां भूमि घोटाले और भ्रष्टाचार पहले से ज्वलंत मुद्दे हैं, हमें सतर्क रहना होगा। क्या यह मामला सच्ची पत्रकारिता का दमन है या अपराध और धनबल का उदाहरण? जवाब जांच में छिपा है। हम इस खबर में किसी भी सूरत में इन पत्रकारों का बचाव नहीं कर रहे हैं, बस हमारे कुछ सवाल हैं जो की जायज है भी हैं और वर्तमान में गैस एजेंसीयों द्वारा की जा रही कालाबाजारी पर सटीक बैठते हैं.

Exit mobile version