दीप मैठाणी NIU ✍️संपादक, देहरादून, मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति के संयोजक लुसन टोडरिया द्वारा मूल निवास और सशक्त भू कानून को लेकर 30 नवंबर को गांधी पार्क स्थित आयोजित धरने में भागीदारी हेतु उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के अध्यक्ष बॉबी पवार को पत्र लिखा गया है, जिसके बाद बॉबी पंवार द्वारा पत्र को सार्वजनिक करते हुए मूल निवास व भू कानून के समर्थकों को इस प्रदर्शन में शामिल होने के लिए फेसबुक पोस्ट द्वारा आमंत्रित किया गया है।
इसके बाद से प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है। गौरतलब है कि इन दिनों देहरादून का हृदय कहे जाने वाला परेड ग्राउंड गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) का 71वां अधिवेशन यहां जारी है, जिसमें देशभर से हजारों कार्यकर्ता और प्रतिनिधि पहुंचे हैं। इतनी बड़ी संख्या में लोगों के आगमन ने राजधानी की सड़कों पर दबाव बढ़ा दिया है। प्रशासन द्वारा पार्किंग, रूट डायवर्जन और सुरक्षा की कई योजनाएं तो बनाई गईं, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग हैं, ट्रैफिक व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या प्रशासन इस प्रदर्शन की अनुमति मूल निवास भू कानून संघर्ष समिति को देगा? क्योंकि गांधी पार्क परेड ग्राउंड के बिल्कुल समीप है।
वहीं जब हमारी बात इस संदर्भ पर मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति के संयोजक लुसन टोडरिया से हुई तो उन्होंने बताया कि उन्होंने प्रशासन को सूचनार्थ पत्र दे दिया था जिसकी उनके पास रिसीविंग भी है, इसलिए उनका धरना प्रदर्शन होना निश्चित है।
मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति ने गांधी पार्क के बाहर धरना-प्रदर्शन की घोषणा की है। समिति की मांग है कि प्रदेश में जमीनों की अंधाधुंध बिक्री पर रोक लगाई जाए और स्थायी निवासियों के हितों की रक्षा के लिए प्रभावी भू-कानून लागू किया जाए। हालांकि यहां आप पाठकों को बता दें की वर्तमान सरकार भू कानून उत्तराखंड में लागू कर चुकी है परंतु सरकार द्वारा जारी किए गए भू कानून से यह समिति संतुष्ट नहीं है ऐसे में यह आंदोलन यदि शुरू होता है, तो शहर प्रशासन के सामने परिस्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाएगी। गांधी पार्क का इलाका पहले से ही संवेदनशील यातायात क्षेत्र है, आसपास सचिवालय, डीएम कार्यालय और व्यापारिक क्षेत्र जैसे अहम स्थान हैं। प्रशासन के लिए मुश्किल यह है कि एक ओर राष्ट्रीय स्तर के अधिवेशन की जिम्मेदारी है, जबकि दूसरी ओर स्थानीय असंतोष को संभालना भी आवश्यक है। भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा, और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों का संतुलन एक जटिल कार्य बन जाता है। यदि प्रशासन कोई कठोर कदम उठाता है, तो राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया के रूप में नई समस्या खड़ी हो सकती है, वहीं यदि निष्क्रिय रहता है, तो “व्यवस्था चरमराने” की स्थिति निश्चित है।

